लोग पूछे Shiksha kya hai | मिलकर जाने?

ये दुनिया कितनी निराली हैं आज मुझसे एक व्यक्ति ने पूछा Shiksha kya hai? मैं मन ही मन मुस्कुराया और सोचा की क्यों न एक आर्टिकल लिखा जाये और आज संसार को shiksha ki paribhasha, उसका महत्व और उसकी असल कीमत बताई जाये। आशा करता हूँ आपको आनंद आएगा।

मेरे विचार में शिक्षा अमृत की वो धारा के सामान हैं जिसके सेवन मात्र से भिकारी राजा और राजा सम्राट के समान बन सकता हैं किन्तु सिर्फ सेवन ही नहीं उसका सदुपयोग भी अत्यावश्यक हैं, एक दुरूपयोग पूरा तख्ता भी पलट सकता हैं, शिक्षा वो ज्वाला हैं जिसने बड़े से बड़े महारथी को भस्म किया हैं और सोना पिघलके कुंदन भी बनाया हैं, मेरी बातो की गहरायी को काम मत आंकना मेरे मित्र इसने काले कोयले को हीरा भी बनाया है।

Shiksha kya hai

साधारण भाषा में कहे तो शिक्षा का अर्थ है ज्ञान की प्राप्ति करना, कितनी करना वो आप पर निर्भर करता है, ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती जितना जितना ज्ञान मनुषय अपने जीवन में ग्रहण करता जाता है उतनी ही उसकी बुद्धि समय के साथ-साथ तीव्र और प्रगतिशील बनती जाती है किन्तु मेरी हमेशा से ही ये गुजारिश रही ह हर व्यक्ति से की सदैव अपनी शिक्षा को सम्मान दे और कभी भी उसपर घमंड न करे।

सदुपयोग करे या दुरूपयोग?

शिक्षा के सदुपयोग और दुरूपयोग में अंतर बताने के लिए एक बड़ा सुन्दर उदाहरण सूझा हैं:
याद कीजिये महाभारत की पौराणिक गाथा जहा शिक्षा में महारथी तो कृष्ण और शकुनि दोनों थे परन्तु जीत हमेशा कृष्ण की होती थी। इसकी वजह ये कत्तई नहीं हैं की कृष्ण नारायण के अवतार थे परन्तु इसका असली कारण हैं शिक्षा का उपयोग। जहा हर पड़ाव में दोनों ने अपनी बुद्धि का सटीक उपयोग सही समय और सही जगह पर किया किन्तु दोनों की मंशा में ज़मीन आसमान का अंतर था। जहा एक धर्म की स्थापना के लिए शिक्षा का सेवन करते थे और दूसरे विध्वंस के लिए। अंततः कृष्ण की शिक्षा का सदुपयोग उन्हें विजय की ओर ले गया और शकुनि की शिक्षा उन्ही के सर्वनाश का कारण बानी।

मुझे आशा है कि मैं आपको उदाहरण का नैतिक समझाने में सक्षम रहा कि Shiksha kya hai अथवा उसका सदुपयोग व दुरूपयोग।

श्रीमद्भगवत गीता के सत्य कथन

shiksha ka kya arth hai यह जानने के लिए आईये श्रीमद्भगवत गीता के कुछ प्रिये लेख पढ़े।

उचित नजरिया

‘जो ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान और कर्म को एक रूप में देखता है, उसी का नजरिया सही है.’

अनुशासन है ज़रूरी

‘आत्म-ज्ञान की तलवार से काटकर अपने ह्रदय से अज्ञान के संदेह को अलग कर दो. अनुशासित रहो, उठो.’

पूर्णता(Perfection)

‘जब वे अपने कार्य में आनंद खोज लेते हैं तब वे पूर्णता प्राप्त करते हैं.’

कर्म कि पहचान

जो कार्य में निष्क्रियता और निष्क्रियता में कार्य देखता है वह एक बुद्धिमान व्यक्ति है.’

सद्गुरु (अच्छा गुरु) हमेशा deserving शिष्य को ही मिलते है।

महात्मा गाँधी जी के विचार से shiksha kya hai?

“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्कृष्ट विकास से है”

स्वामी विवेकानंद क्या कहते है?

” मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है”

“जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सके और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। “

शिक्षा की सर्वप्रथम 3 व्याख्याए

अब जैसा की बात आचुकी है shiksha ke prakar की तो पता लगते है कि कोनसी ३ व्याख्याओं से जनि जाती है शिक्षा।

औपचारिक शिक्षा

हर प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने के लिए एक मनुष्य को गुरु की आवश्यकता होती है, वह आपको न केवल इतने संघर्ष से प्राप्त ज्ञान प्रदान करते है बल्कि अपने जीवन के सम्पूर्ण अनुभव से भी अवगत करवाते है। दूसरे शब्दों में विद्यालय या गुरुकुल जाकर प्राप्त की गयी शिक्षा औपचारिक शिक्षा कहलाती है। जिसमे व्यक्ति को उचित रणनीतियों और संरचित योजना के साथ आध्यात्मिक, स्पष्ट, तीक्ष्ण अथवा निहित ज्ञान का बोध कराया जाता हैं।

अनौपचारिक शिक्षा

जैसा कि मैंने ऊपर कहा हर व्यक्ति तो एक गुरु कि आवश्यकता होती है परन्तु अनौपचारिक शिक्षा में कैसे गुरु भला?
अनौपचारिक शिक्षा एक मात्र ऐसी शिक्षा है जहा स्वयं हमारी मातृभूमि/हमारी धरती माँ हमारी गुरु बनके हमे संसार कि सचाई से अवगत करवाती है जिसे आम लोग अपनी भाषा में “अपने परिवेश से गृहीत दृष्टिकोण, मूल्य, कौशल, ज्ञान और अनुभव” कहते हैं।

निरोपचारिक शिक्षा

हमने पढ़ा औपचारिक में इंसान विद्यालय अथवा गुरुकुल में जाकर गुरु से ज्ञान प्राप्त करता है और अनौपचारिक में परिवेश से ज्ञान एकत्रित करता है। परन्तु जिस मोड़ पर यह दोनों एक साथ किये जाते है वह निरोपचारिक में तब्दील होजाता है। अर्थात जब परिवेश में रह कर पूरी रणनीतियों और संरचित योजना के साथ संसार का ज्ञान ग्रहण किया जाये।

निष्कर्ष

अगर आप शिद्धत से पूरा लेख पढ़ते हुए निष्कर्ष तक पहुंचे है तो मैं आपसे सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा की शिक्षा को महत्व दे और सच्चे मन से ग्रहण करे क्योंकि शिक्षा प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती मनुष्य जीवन के अंतिम क्षण तक कुछ न कुछ सीखता है। अतः निचे कमेंट सेक्शन में बताये किस किस ने हमारे लेख से आज कुछ नया सीखा/हासिल किया है।

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